अकबर इलाहाबादी की शायरी -Akbar allahabadi Shayari In Hindi

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अकबर इलाहाबादी की शायरी -Akbar allahabadi Shayari In Hindi

अकबर इलाहाबादी की शायरी – Akbar allahabadi Shayari In Hindi


अकबर इलाहाबादी के शेर – Sher Of Akbar Allahabadi In Hindi
अकबर इलाहाबादी के नज़्म – Nazms Of Akbar Allahabadi In Hindi
अकबर इलाहाबादी के रुबाई –  Rubaai Of Akbar Allahabadi In Hindi
अकबर इलाहाबादी के क़ितआ –  Qita Of Akbar Allahabadi In Hindi
अकबर इलाहाबादी के हास्य –  Humor Of Akbar Allahabadi In Hindi
अकबर इलाहाबादी के ग़ज़ल –  Ghazal Of Akbar Allahabadi In Hindi

अकबर इलाहाबादी के शेर – Sher Of Akbar Allahabadi In Hindi


अकबर दबे नहीं किसी सुल्ताँ की फ़ौज से
लेकिन शहीद हो गए बीवी की नौज से

अक़्ल में जो घिर गया ला-इंतिहा क्यूँकर हुआ
जो समा में आ गया फिर वो ख़ुदा क्यूँकर हुआ

अगर मज़हब ख़लल-अंदाज़ है मुल्की मक़ासिद में
तो शैख़ ओ बरहमन पिन्हाँ रहें दैर ओ मसाजिद में

अब तो है इश्क़-ए-बुताँ में ज़िंदगानी का मज़ा
जब ख़ुदा का सामना होगा तो देखा जाएगा

असर ये तेरे अन्फ़ास-ए-मसीहाई का है ‘अकबर’
इलाहाबाद से लंगड़ा चला लाहौर तक पहुँचा

आई होगी किसी को हिज्र में मौत
मुझ को तो नींद भी नहीं आती

आशिक़ी का हो बुरा उस ने बिगाड़े सारे काम
हम तो ए.बी में रहे अग़्यार बी.ए हो गए

आह जो दिल से निकाली जाएगी
क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ

ग़ज़ब है वो ज़िद्दी बड़े हो गए
मैं लेटा तो उठ के खड़े हो गए

इन को क्या काम है मुरव्वत से अपनी रुख़ से ये मुँह न मोड़ेंगे
जान शायद फ़रिश्ते छोड़ भी दें डॉक्टर फ़ीस को न छोड़ेंगे

इलाही कैसी कैसी सूरतें तू ने बनाई हैं
कि हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है

इश्क़ के इज़हार में हर-चंद रुस्वाई तो है
पर करूँ क्या अब तबीअत आप पर आई तो है

इश्वा भी है शोख़ी भी तबस्सुम भी हया भी
ज़ालिम में और इक बात है इस सब के सिवा भी

इस क़दर था खटमलों का चारपाई में हुजूम
वस्ल का दिल से मिरे अरमान रुख़्सत हो गया

उन्हें भी जोश-ए-उल्फ़त हो तो लुत्फ़ उट्ठे मोहब्बत का
हमीं दिन-रात अगर तड़पे तो फिर इस में मज़ा क्या है

कुछ इलाहाबाद में सामाँ नहीं बहबूद के
याँ धरा क्या है ब-जुज़ अकबर के और अमरूद के

कुछ तर्ज़-ए-सितम भी है कुछ अंदाज़-ए-वफ़ा भी
खुलता नहीं हाल उन की तबीअत का ज़रा भी

कुछ नहीं कार-ए-फ़लक हादसा-पाशी के सिवा
फ़ल्सफ़ा कुछ नहीं अल्फ़ाज़-तराशी के सिवा

ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता
आँख उन से जो मिलती है तो क्या क्या नहीं होता

अकबर इलाहाबादी के नज़्म – Nazms Of Akbar Allahabadi In Hindi


नामा न कोई यार का पैग़ाम भेजिए
इस फ़स्ल में जो भेजिए बस आम भेजिए
ऐसा ज़रूर हो कि उन्हें रख के खा सकूँ
पुख़्ता अगरचे बीस तो दस ख़ाम भेजिए
मालूम ही है आप को बंदे का ऐडरेस
सीधे इलाहाबाद मिरे नाम भेजिए
ऐसा न हो कि आप ये लिक्खें जवाब में
तामील होगी पहले मगर दाम भेजिए

देख आए हम भी दो दिन रह के देहली की बहार
हुक्म-ए-हाकिम से हुआ था इजतिमा-ए-इंतिशार
आदमी और जानवर और घर मुज़य्यन और मशीन
फूल और सब्ज़ा चमक और रौशनी रेल और तार
केरोसिन और बर्क़ और पेट्रोलियम और तारपीन
मोटर और एरोप्लेन और जमघटे और इक़्तिदार
मशरिक़ी पतलूँ में थी ख़िदमत-गुज़ारी की उमंग
मग़रिबी शक्लों से शान-ए-ख़ुद-पसंदी आश्कार
शौकत-ओ-इक़बाल के मरकज़ हुज़ूर-ए-इमपरर
ज़ीनत-ओ-दौलत की देवी इम्प्रेस आली-तबार
बहर-ए-हस्ती ले रहा था बे-दरेग़ अंगड़ाइयाँ
थेम्स की अमवाज जमुना से हुई थीं हम-कनार
इंक़िलाब-ए-दहर के रंगीन नक़्शे पेश थे
थी पए-अहल-ए-बसीरत बाग़-ए-इबरत में बहार
ज़र्रे वीरानों से उठते थे तमाशा देखने
चश्म-ए-हैरत बन गई थी गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार
जामे से बाहर निगाह-ए-नाज़-ए-फ़त्ताहान-ए-हिन्द
हद्द-ए-क़ानूनी के अंदर ऑनरेबलों की क़तार
ख़र्च का टोटल दिलों में चुटकियाँ लेता हुआ
फ़िक्र-ए-ज़ाती में ख़याल-ए-क़ौम ग़ाएब फ़िल-मज़ार
दावतें इनआ’म स्पीचें क़वाइ’द फ़ौज कैम्प
इज़्ज़तें ख़ुशियाँ उम्मीदें एहतियातें ए’तिबार
पेश-रौ शाही थी फिर हिज़-हाईनेस फिर अहल-ए-जाह
बअ’द इस के शैख़ साहब उन के पीछे ख़ाकसार

अकबर इलाहाबादी के रुबाई –  Of Akbar Allahabadi In Hindi


भूलता जाता है यूरोप आसमानी बाप को
बस ख़ुदा समझा है उस ने बर्क़ को और भाप को
बर्क़ गिर जाएगी इक दिन और उड़ जाएगी भाप
देखना ‘अकबर’ बचाए रखना अपने आप को

दुनिया से मेल की ज़रूरत ही नहीं
मुझ को इस खेल की ज़रूरत ही नहीं
दरपेश है मंज़िल-ए-अदम ऐ ‘अकबर’
इस राह में रेल की ज़रूरत ही नहीं

एज़ाज़-ए-सलफ़ के मिटते जाते हैं निशाँ
अगले से ख़यालात हिन्द में अब वो कहाँ
सय्यद बनना हो तो बनो सर-सय्यद
होना हो जो ”ख़ाँ” तो बनो अंग्रेज़-ख़्वाँ

ग़फ़लत की हँसी से आह भरना अच्छा
अफ़आल-ए-मुज़िर से कुछ न करना अच्छा
‘अकबर’ ने सुना है अहल-ए-ग़ैरत से यही
जीना ज़िल्लत से हो तो मरना अच्छा

अकबर इलाहाबादी के क़ितआ –  Qita Of Akbar Allahabadi In Hindi


बे-पर्दा नज़र आईं जो कल चंद बीबियाँ
‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरत-ए-क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो मैं ने आप का पर्दा वो क्या हुआ
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों के पड़ गया

छोड़ लिटरेचर को अपनी हिस्ट्री को भूल जा
शैख़-ओ-मस्जिद से तअ’ल्लुक़ तर्क कर स्कूल जा
चार-दिन की ज़िंदगी है कोफ़्त से क्या फ़ाएदा
खा डबल रोटी क्लर्की कर ख़ुशी से फूल जा

इक बर्ग-ए-मुज़्महिल ने ये स्पीच में कहा
मौसम की कुछ ख़बर नहीं ऐ डालियो तुम्हें
अच्छा जवाब-ए-ख़ुश्क ये इक शाख़ ने दिया
मौसम से बा-ख़बर हों तो क्या जड़ को छोड़ दें

अकबर इलाहाबादी के हास्य –  Humor Of Akbar Allahabadi In Hindi


ख़ुदा-हाफ़िज़ मुसलामानों का ‘अकबर’
मुझे तो उन की ख़ुश-हाली से है यास
ये आशिक़ शाहिद-ए-मक़्सूद के हैं
न जाएँगे व-लेकिन सई के पास
सुनाऊँ तुम को इक फ़र्ज़ी लतीफ़ा
किया है जिस को मैं ने ज़ेब-ए-क़िर्तास
कहा मजनूँ से ये लैला की माँ ने
कि बेटा तू अगर कर ले एम-ए पास
तो फ़ौरन बियाह दूँ लैला को तुझ से
बिला-दिक़्क़त मैं बन जाऊँ तिरी सास
कहा मजनूँ ने ये अच्छी सुनाई
कुजा आशिक़ कुजा कॉलेज की बकवास
कुजा ये फ़ितरती जोश-ए-तबीअत
कुजा ठूँसी हुई चीज़ों का एहसास
बड़ी बी आप को क्या हो गया है
हिरन पे लादी जाती है कहीं घास
ये अच्छी क़द्र-दानी आप ने की
मुझे समझा है कोई हरचरण-दास
दिल अपना ख़ून करने को हूँ मौजूद
नहीं मंज़ूर मग़्ज़-ए-सर का आमास
यही ठहरी जो शर्त-ए-वस्ल-ए-लैला
तो इस्तीफ़ा मिरा बा-हसरत-ओ-यास

अकबर इलाहाबादी के ग़ज़ल –  Ghazal Of Akbar Allahabadi In Hindi


1. आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते
अरमान मिरे दिल के निकलने नहीं देते
ख़ातिर से तिरी याद को टलने नहीं देते
सच है कि हमीं दिल को सँभलने नहीं देते
किस नाज़ से कहते हैं वो झुँझला के शब-ए-वस्ल
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते
परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यूँ हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते
हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते
दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते
गर्मी-ए-मोहब्बत में वो हैं आह से माने’
पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते

2. आह जो दिल से निकाली जाएगी
क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी
इस नज़ाकत पर ये शमशीर-ए-जफ़ा
आप से क्यूँकर सँभाली जाएगी
क्या ग़म-ए-दुनिया का डर मुझ रिंद को
और इक बोतल चढ़ा ली जाएगी
शैख़ की दावत में मय का काम क्या
एहतियातन कुछ मँगा ली जाएगी
याद-ए-अबरू में है ‘अकबर’ महव यूँ
कब तिरी ये कज-ख़याली जाएगी

3. अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए
अख़बार में तो नाम मिरा छाप दीजिए
देखो जिसे वो पाइनियर ऑफ़िस में है डटा
बहर-ए-ख़ुदा मुझे भी कहीं छाप दीजिए
चश्म-ए-जहाँ से हालत-ए-असली छुपी नहीं
अख़बार में जो चाहिए वो छाप दीजिए
दा’वा बहुत बड़ा है रियाज़ी में आप को
तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ को तो नाप दीजिए
सुनते नहीं हैं शैख़ नई रौशनी की बात
इंजन की उन के कान में अब भाप दीजिए
इस बुत के दर पे ग़ैर से ‘अकबर’ ने कह दिया
ज़र ही मैं देने लाया हूँ जान आप दीजिए

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